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कौन हैं मा काली, क्या हैं उनकी विवेकानंद और रामकृष्ण से जुड़ी कहानियां

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हिंदुओं की आराध्य शक्ति की देवी मां काली चर्चाओं में हैं. शास्त्र कहते हैं कि ईसा के सैकड़ों सालों पहले से काली के स्वरूप की पूजा लोग करते रहे हैं. वो बुराई और बुराई की ताकतों का संहार करने वाली देवी हैं. ऐसी ताकत जो किसी भी बुरी ताकत को परास्त कर सकती हैं. विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस उनके परम उपासक थे.

काली या महाकाली को कई नामों से बुलाया जाता है. वह सुन्दरी रूप वाली भगवती पार्वती का काला और भयप्रद रूप हैं. जिनकी उत्पत्ति निशाचरों के संहार के लिए हुई थी. उनको खासतौर पर बंगाल, ओडिशा और असम में पूजा जाता है. काली को शाक्त परम्परा की दस महाविद्याओं में एक भी माना जाता है. वैष्णो देवी में दाईं पिंडी माता महाकाली की ही है |

‘काली’ का अभिप्राय है काल या समय से पैदा हुईं। वह बुराई, निशाचरीय प्रकृति के लोगों को कभी माफ नहीं करतीं। बुराई को दमित करती हैं. इसलिए माँ काली अच्छे मनुष्यों की शुभेच्छु और पूजनीय हैं. बांग्ला में काली का एक और आशय होता है – स्याही या रोशनाई.

निशाचरों के संहार की कहानी
हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार शुम्भ और निशुम्भ दो निशाचर भाई थे जो महर्षि कश्यप और दनु के पुत्र तथा रम्भ , नमुचि , हयग्रीव , स्वरभानु , दैत्यराज , करंभ , कालकेतु और वप्रिचिती के भाई थे. दुर्गा चालिसा में भी इन दोनों भाइयों और काली की महिमा का बखान किया गया है.

कहा जाता है कि इन्द्र महेन्द्र ने एक बार नमुचि को मार डाला. तो नाराज होकर शुम्भ-निशुम्भ ने उनसे महेन्द्रासन छीन लिया.शासन करने लगे. इसी बीच पार्वती ने महिषासुर को मारा. तब शुम्भ और निशुम्भ उनसे बदला लेने के लिए निकल पड़े.

पार्वती के सामने दोनों ने अजीब सी शर्त रखी कि वे या तो उनमें किसी एक से विवाह करें या मरने को तैयार हो जाएं. पार्वती ने युद्ध के लिए ललकारा. कहा कि युद्ध में मुझे जो भी परास्त करेगा, उसी से मैं विवाह कर लूँगी.युद्ध में दोनों मारे गए.

लंदन की एक लाइ्ब्रेरी में रखी दक्षिणकाली की एक पेंटिंग. जिसमें शिव पर नृत्य कर रही हैं.

प्रमुख मंदिर
कोलकाता के बैरकपुर का दक्षिणेश्वर काली मंदिर सबसे प्रसिद्ध काली मंदिरों में एक है. ये ऐतिहासिक है. मंदिर की मुख्य देवी भवतारिणी है, जो हिन्दू देवी काली माता ही है. कोलकाता के कालीघाट मन्दिर के बाद ये सबसे प्रसिद्ध काली मंदिर है. इसे 1854 में जान बाजार की रानी रासमणि ने बनवाया था.
इसी मंदिर में स्वामी रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद उनकी आराधना भी करते थे. वर्ष 1857-68 के बीच स्वामी रामकृष्ण इस मंदिर के प्रधान पुरोहित रहे. फिर ये उनकी साधनास्थली बन गई. विवेकानंद और काली मां को लेकर एक कहानी भी बहुत प्रचलित है.

विवेकानंद और उनकी काली उपासना
विवेकानंद तब पढ़ाई कर रहे थे. वह एमए में थे. तब उन्हें नरेंद्र के नाम से जाना जाता था. वह काली के परम उपासक थे. परमहंस रामकृष्ण के प्रिय शिष्य थे. 1884 में उनके पिता विश्जंगलाथ दत्त का निधन हो गया. पारिवार आर्थिक तंगी से गुजरने लगा. तब नरेंद्र पर भी नौकरी करने का दबाव पड़ने लगा. उन्होंने नौकरी तलाशने की कोशिश शुरू की लेकिन बात नहीं बनती दिखी तो एक दिन देव रामकृष्ण के पास पहुंचे और अपने परिवार के मुश्किल हालात के साथ खुद पर नौकरी पर पड़ रहे दबाव की बता बताकर पूछा अब कैसे रास्ता निकलेगा.

रामकृष्ण ने कहा, तुरंत मंदिर में अंदर मां काली के पास जाओ और उनसे कहा कि परिवार की आर्थिक तंगी दूर करें. विवेकानंद मां की मूर्ति के सामने पहुंचे और उनके मातृ रूप को देखकर श्रृद्धा से भर उठे. मां से प्रार्थना करने लगे – मां विवेक दो, वैराग्य दो और भक्ति दो, ऐसा कुछ करो कि रोज तुम्हारे दर्शन हो पाएं. जब बाहर पहुंचे तो परमहंस ने पूछा – क्या मां से आर्थिक तंगी दूर करने की प्रार्थना की. विवेकानंद ने कहा – नहीं.

रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद मां काली के परम उपासक थे. जिंदगीभर में वो मां काली की उपासना करते रहे . (courtesy – isha Formation)

रामकृष्ण ने दोबारा उनको भेजा. इस बार उन्होंने वही किया जो पहली बार किया था. तीसरी बार फिर वही. तब रामकृष्ण ने कहा कि अब मुझको ही तुम्हारे लिए कुछ करना होगा. उन्होंने उन्हें आशीष दिया कि उनके परिवार को कभी खाने और कपडे़ की कमी नहीं हो. ऐसा ही हुआ. विवेकानंद जिंदगीभर मां काली के परम उपासक बने रहे.

रामकृष्ण और काली
रामकृष्ण परमहंस ने अपना ज्यादातर जीजंगल एक परम भक्त की तरह बिताया. वह काली के भक्त थे. उनके लिए काली कोई देवी नहीं थीं, वह एक जीवित अधिकारीकत थीं. काली उनके सामने नाचती थीं, उनके हाथों से खाती थीं, उनके बुलाने पर आती थीं. उन्हें मर्यादा।ंदविभोर छोड़ जाती थीं. यह वास्तव में होता था, यह घटना वाकई होती थी. उन्हें कोई मतिभ्रम नहीं था, वह वाकई काली को खाना खिलाते थे.
जब वह उनके भीतर प्रबल होतीं, तो वह मर्यादा।ंदविभोर हो जाते. नाचना-गाना शुरू कर देते. जब वह थोड़े मंद होते और काली से उनका संपर्क टूट जाता, तो वह किसी शिशु की तरह रोना शुरू कर देते.

महाभारत से लेकर वेदों तक में उल्लेख
काली का उल्लेख सबसे पहले अर्थववेद में हुआ. इसके बाद महाभारत में उनका उल्लेख हुआ है. बंगाल में वह हमेशा से मुख्य शक्ति की देवी रही हैं. बंगाल में सुभाष चंद्र बोस से लेकर तकरीबन हर नेता उनकी आराधना या भक्तिभाव दिखाया हुआ मिलेगा. वहां काली पर महाकाव्य और काव्य लिखे गए. उनकी वीरता को लेकर तमाम कहानियां पुराणों में हैं.

तंत्र मंत्र और शक्ति की उपासना करने वाले
देशभऱ में काली को तंत्र मंत्र की देवी मानते हैं तो शक्ति और बुराइयों से लड़ने वाली शक्ति भी. हालांकि उनके मातृरूप का भी बखान हुआ है. वह पार्वती का एक अंग हैं तो शिव और शक्ति के करीब. वह त्रिशूल से लेकर हंसुली और खडग जैसे कई शस्त्रों का इस्तेमाल करती हैं.

Tags: Durga Pooja, Religious



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